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अयोध्या विवाद पर चल रहे मुकदमे में गुरुवार को नया मोड़ आ गया, जब उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे का न्यायिक फैसला होगा कि विवादित स्थल पर बनी मस्जिद इस्लामिक संस्कृति और भावनाओं के अनुसार बनी थी या नहीं । रामजन्मस्थान पुनरुद्धार समिति के वकील की दलील पर शीर्ष अदालत ने कहा मस्जिद के रूप में नहीं इस्तेमाल हुआ विवादित ढांचा रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब जन्मस्थान पुनरोद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने कहा, यह मस्जिद इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार नहीं बनी थी । लिहाजा इसे मस्जिद नहीं कहा जा सकता । यह ढांचा कभी मस्जिद के रूप में प्रयोग ही नहीं किया, इसमें कभी नियमित नमाज नहीं हुई ।

मिश्रा ने दलील दी कि हनीफी इस्लामिक कानून जो भारत में मध्यकाल से लेकर अब तक मान्य है, उसके मुताबिक मस्जिद तभी मानी जाएगी, जब वह स्वतंत्र रूप से खरीदी गई जमीन पर बनी हो । उसे लोकार्पित किया गया हो । उसमें मुअज्जन हो, जो अजान देकर लोगों को नमाज के लिए बुलाए । दूसरे धर्म का कोई स्थान उसके पास न हो ।

मिश्रा ने कहा कि विद्वान काजी मुहद्दीस ने इसे अपनी किताब में लिखा है, जो प्राचीन काल से मान्य है । यहां तक कि बाबर से पहले अलाउद्दीन खिलजी के समय भी यही व्यवस्था थी, लेकिन यहां मस्जिद जबरन कब्जा किए गए मंदिर पर बनी है । इसके ही साथ उसमें हिंदू भी पूजा करते रहे । इसमें कभी मुअज्जन नहीं रहा, इसमें मूर्तियां थीं और खंबों पर देव चित्र खुदे थे, घंटियां भीं ।

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