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कोलेजियम व्यवस्था में बदलाव को लेकर एक वक्त पर सरकार की ओर से कवायद बड़ी तेज हुई थी, लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता का हनन बताकर सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानने से इनकार कर दिया था। मोदी सरकार कोलेजियम के पक्ष में शुरू से नही थी। इस बीच इलाहाबाद हाई के जस्टिस पाण्डेय ने कोलेजियम पर गंभीर सवाल खड़ा करते हुए कहा, भावी न्यायाधीशों का नाम नियुक्ति प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही सार्वजनिक किए जाने की परंपरा रही है। अर्थात कौन किस आधार पर चयनित हुआ है इसका निश्चित मापदंड ज्ञात नहीं है। साथ ही प्रक्रिया को गुप्त रखने की परंपरा पारदर्शिता के सिद्धांत को झूठा सिद्ध करने जैसी है।

जस्टिस पांडेय  ने अपने पत्र में 34 साल के अनुभव को साझा करते हुए लिखते है कि 34 वर्ष के सेवाकाल में बड़ी संख्या में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को देखने का अवसर मिला है जिनमें कई न्यायाधीशों के पास सामान्य विधिक ज्ञान तक नहीं था, अर्थात सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में नियुक्ति का कोई मापदंड नहीं है। यहां प्रचलित कसौटी है परिवारवाद और जातिवाद की है। यह पत्र कोलेजियम व्यवस्था के साथ न्याय पालिका पर भी प्रश्न चिन्ह है।

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